Saturday, October 25, 2008

मेरा दोस्त

बम -बम

बम - बम मेरा या यूँ कहें तो हमारा (हमारा इस लिए कि वह मेरा और मेरे छोटे भाई का ,जो मुझसे कुछ साल ही छोटा है ) पहला दोस्त था मैं उस समय तीन साल का था ।जब मेरे पापा ने झारखण्ड (पहले बिहार) के गढ़वा शहर में व्याख्याता के पद पर योगदान किया था।इसी कारण मेरा परिवार गढ़वा चला आया। मैं उस नई जगह पर बहुत ही खुश था नई जगह ,नया वातावरण ,नया शहर और सबसे बड़ी बात मैं पहली बार, शहर में आया था। किराये का मकान थाजिसकी पहली मंजिल पर हम रहा करते थे। उसके सामने बहुत बड़ा मैदान था जिसमें शाम को बहुत सारे लड़के खेलने आते थे। उसी मैदान के एक कोने पर एक बड़ा-सा मकान था जिसमें शर्मा जी रहते थे वो पेशे से इंजीनियर थे बम -बम उन्हीं का छोटा लड़का था।घर पास में ही होने के कारण हमारा उनके यहाँ आना - जाना लगा रहता था। मैं और मेरा छोटा भाई बम-बम के साथ खेलने के लिए जाते थे
उसके पास एक छोटी सी साईकिल थी सच बताऊँ वही साईकिल हमारे आकर्षण का कारण थी उसी साईकिल को चलाने की इच्छा से हम उसके यहाँ जाते थे मैं साईकिल के पीछे - पीछे जाने कितनी देर तक भागता रहता था। मैं उम्र में सबसे बड़ा था,इसलिए साईकिल चलाने का मौका कम ही पाता था पर जाने क्यों मुझे उसे चलाने से ज्यादा ,उसके पीछे-पीछे भागने में ही ज्यादा आनंद आता था।कभी साईकिल के साथ -साथ तो कभी उसके पीछे- पीछे। हमारा यह खेल बम-बम के लॉन मैं लगे अमरूद के पेड़ से शुरू होकर मैदान में बने गोलंबर तक चलता रहता था।हम में से किसी की पढ़ाई अब तक शुरू नहीं हो पाई थी ,इसलिए दिन में हमारी कोशिश यही रहती थी कि हम साथ में खेलते रहे जब तक कि हमारे घर से कोई बुलाने जाए
बद्री जी, जो बम -बम के पापा के ऑफिस में काम करते थे, वो भी वहीँ पास के खपरैल वाले घर में रहते थेउसी घर में मुर्गियों भी पालीं गई थीं बद्री जी ही उनको दाना - पानी दिया करते थेबम-बम हमें अक्सर उस दडबे के पास ले जाया करता था और हम बाहर की जाली से उन मुर्गियों को देखा करते थेबम -बम समय -समय पर बताया करता था की किस मुर्गी ने आज अंडा दिया है ? इसी तरह समय बीत रहा था
एक बार हम दशहरे की छुटियों में घर गए थेजब वापस लौटे तो पता चला कि उसके पापा का तबादला किसी दूसरे शहर में हो गया हैवो लोग आज सुबह जा रहे हैं अगली सुबह जब मेरी नींद खुली तो पता चला की वो लोग चले गए हैंमैं उससे नहीं मिल पाया
धीरे -धीरे समय बीतता गयाकहते हैं कि यादों के आईने में जब वक्त की धूल जमने लगती है तो चेहरे भी धुंधले दिखते हैंयही मेरे साथ भी हुआ है आज मुझे मेरे दोस्त का चेहरा याद नहीं हैउसके उस किराये वाले मकान को देखता हूँ तो उसकी बातें याद आ जाती हैं
पिछले साल उसके मम्मी -पापा हमारे शहर आए थेउनसे हमारी मुलाकात हुई थीउनको मैंने लगभग बीस साल के बाद देखा थाकुछ -कुछ स्मृतियाँ जेहन में अभी-भी बरक़रार हैं ,जिसके कारण मैंने उन्हें देखते ही पहचान लियाबम-बम के बारे में भी थोडी बहुत बातें हुईं पर जाने उसकी बातें सुनकर अपनापन जैसा महसूस नहीं हो रहा थामैंने कुछ और जानने की इच्छा भी प्रकट नहीं कीशायद यह समय का प्रभाव था या फिर मेरी सोच का ....
आज जब मैं अपने बीते हुए कल की यादों में अपने दोस्तों को खोजने की कोशिश कर रहा हूँ तो मुझे अनायास ही बम - बम की याद गई । मैं उसे याद हूँ कि नहीं , यह तो कहना बड़ा मुश्किल हैपर मैं तो यह कह ही सकता हूँ कि बम -बम ही मेरा पहला दोस्त है ................................................

21 comments:

Ratnesh said...

good..
its really nice to remember all ur frnds..
may be one day i ll also get that honour..
keep it up..

रश्मि प्रभा... said...

बहुत अच्छा लगा आपको पढना.......यादों की पृष्ठभूमि
हमेशा साथ होती है,एक दोस्त और बचपन की आदतें
बहुत रोचक लगीं

Manoj Kumar Soni said...

बहुत ... बहुत .. बहुत अच्छा लिखा है
हिन्दी चिठ्ठा विश्व में स्वागत है
टेम्पलेट अच्छा चुना है. थोडा टूल्स लगाकर सजा ले .
कृपया मेरा भी ब्लाग देखे और टिप्पणी दे
http://www.manojsoni.co.nr

bijnior district said...

हिंदी लिखाड़ियों की दुनिया में आपका स्वागत। खूब लिखे। बढ़िया लिखें ..हजारों शुभकामनांए

पुरुषोत्तम कुमार said...

अच्छा लिखा है आपने। शुभकामनांए।

Prakash Badal said...

स्वागत है आपका

shama said...

Shubhkamnayon sahit swagat hai....Yaaden/sansmaran padhna mujhe hameshase achha lagta...abhi to zara sarsari nazar daudayi hai, lekin ek do dinonme mai fursatse padhke tippanee doongi.
Mere blogpe aaneka sasneh nimantran !

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर...आपके इस सुंदर से चिटठे के साथ आपका ब्‍लाग जगत में स्‍वागत है.....आशा है , आप अपनी प्रतिभा से हिन्‍दी चिटठा जगत को समृद्ध करने और हिन्‍दी पाठको को ज्ञान बांटने के साथ साथ खुद भी सफलता प्राप्‍त करेंगे .....हमारी शुभकामनाएं आपके साथ हैं।

अनूप शुक्ल said...

वाह हम समझे थे कि हमारे ही दोस्त का नाम बमबम है।

अभिषेक मिश्र said...

Aisa hi hota hai, hum to purani yaadon mein khoye rahte hai; jabki aur log samay ke sath kahin aage nikal jate hain. Acha laga aapki yaadon se judana.

Unknown said...

हिन्दी ब्लॉग जगत में आपका हार्दिक स्वागत है, मेरी शुभकामनायें…

दिगम्बर नासवा said...

बचपन की यादों में ऐसी महक होती है जो हमेशा ताजा रहती है
जब भी उनमे लौटो वाही खुशबू नज़र आती है

Aruna Kapoor said...

Aisa hi akser hota hai...hum yaadon ke samander mein doobaten hi chale jaate hai!... bahut achchhi rachana, dhanyawad!

Deepak Sharma said...

Likhne ke saath saath achcha padhte bhi rahiye
Kavi Deeoak sharma
http://www.shayardeepaksharma.blogspot.com
http://www.kavideepaksharma.co.in

Deepak Sharma said...

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तरूश्री शर्मा said...

यादें ऐसी ही होती हैं... कभी कुरेदती हैं, कभी कचोटती हैं तो कभी ठंडी हवा के झोंके सी। कुछ चीजें अनायास याद रह जाती हैं... जैसे आपका दोस्त बम-बम। अच्छा लिखा है आपने , अच्छी अभिव्यक्ति। आपको इस सवाल का जवाब भी वक्त जरूर देगा कि उसे आप याद हैं या नहीं।

Vineeta Yashsavi said...

Bahut achha laga padh ke. kafi kuch yaad bhi dila diya apne.

प्रदीप मानोरिया said...

आपका चिट्ठा जगत में स्वागत है निरंतरता की चाहत है

मेरे ब्लॉग पर पधारें आपका स्वागत है

Unknown said...

Jai Bajrang Bali
Dost
mera koi bam-bam jaisa mitra nahi tha isliye thodi kami khalti hai. Apne kuch aise hi palon ko aise hi likhte rahna meri subhkamnaye 2mhre saath hai.

hindi-nikash.blogspot.com said...

आपका ब्लॉग देखा बहुत अच्छा लगा.... मेरी कामना है कि आपके शब्दों को नए अर्थ, नए रूप और विराट संप्रेषण मिलें जिससे वे जन-सरोकारों के समर्थ सार्थवाह बन सकें.......

कभी फुर्सत में मेरे ब्लॉग पर भी पधारें...
http://www.hindi-nikash.blogspot.com

सादर- आनंदकृष्ण, जबलपुर