Sunday, July 4, 2010

बेचारे पति

हम आये दिन महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं. पर वो दिन दूर नहीं जनाब जब पुरुष सशक्तिकरणकी बात कर रहे होंगे. मैं इस बात से सहमत हूँ कि महिलाओं को आगे बढ़ने का मौका मिलना चाहिए. लेकिन पुरुषों ने जो अपनी दुर्गति बीते हुए दशक में करवाई है उससे तो यही लगता है कि ज्यादा दिन दूर नहीं जब इनके सशक्तिकरण की बात उठने लगे. मैं इस बात से इत्तफाक नहीं रखना चाहता कि क्या सही है और क्या गलत. पर हाँ, इस बात से जरूर मतलब है कि क्या होने वाला है. हर तरह से सरकारी एवं गैर सरकारी संस्थाओं और कामों में में आरक्षण और अन्य सुविधाएं देकर महिलाओं कि भागीदारी सुनिश्चित कि जा रही है. ये एक अच्छा कदम है. कुछ महिलाएं तो वास्तव में अच्छा कर रही है. लेकिन कुछ को तो ढोया जा रहा है. खैर इतनी लंबी चौड़ी भूमिका देने के मूड में नहीं हूँ आज. ज्योंज्यों इनकी कामों में भागीदारी बढती जा रही है. इनका गुरूर बढ़ता जा रहा है. मैं एक उदाहरण आज देना चाहता हूँ जो आज ही मुझे पता चला है. मैंने अभी नईनई नौकरी ज्वाइन कि है. जहाँ मैं रहता हूँ उसी मकान में एक महिला शिक्षक हैं. जो एक सरकारी उच्च विद्यालय में प्रभारी प्रधानाचार्य हैं. भाई अच्छे पद पर हैं और अच्छी खासी तनखाह मिल रही है वो भी बिना पढाये तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है. माशाल्लाह खाखा के फुटबाल हो गयी हैं. अब ये मत कहियेगा कि वो खा अपना रही हैं, तो मुझे ऐसी बात नहीं लिखनी चाहिए. अभी तक तो मैं बात उनकी कर रहा था. अब चलिए उनके पति की बात कि जाये जो दुर्भाग्यवश बेरोजगार हैं और उनके पति भी हैं. घर के सारे काम करते हैं. खाना बनने, पानी भरने, बाजार करने से लेकर उनके स्कूल का काम करने तक. वो सुबहसुबह मोटरसाइकिल से उनको स्कूल छोड़ने जाते हैं. उसके बाद दिन-भर का काम साइकिल से ही करते हैं क्योंकि मोटरसाइकिल का उपयोग अन्य कामों के लिए मनाही है. अभी जनगणना का काम हो रहा था. उन्होंने ही सारे काम किये. मैडम तो आराम कर रही थीं पूरी गर्मी में. वो चुपचाप से ही रहते हैं. और हो भी क्यों ? गुजारा जो करना है. ये बात सच है कि अगर आपकी पत्नी काम करती है तो उसको उस बात का गुरुर हो जाता है. पुरुषों में यह बात कम ही देखने को मिलती है. महिला पाठक ये सोचें कि मैं एक पक्षीय बात कर रहा हूँ. ये सही है. और सबसे बुरी बात तो आज लगी जो मैंने अपने कानों सुनी. उसकी के बाद मैंने इसे लिखने का निश्चय किया. आज शाम को दोनों लोग रसोई में काम कर रहे थे. किसी बात पर महिला ने कहा कि –“तुम काम करते हो या मैं? जो मुझे नसीहत देते रहते हो. जब पढाई करनी थी तुमें नौकरी के लिए तब तो तुम अपनी भाभी के साथ मस्ती कर रहे थे, मजे कर रहे थे. इसलिए अपने काम से मतलब रखा करो”. सुनकर मैं दंग था. नौकरी तो बहुत से लोग करते हैं पर इस तरह का व्यक्तव्य शायद ही सुनने को मिलता है और ये एक जिम्मेदार नागरिक को शोभा भी नहीं देता.

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