Monday, July 5, 2010

लीचू


हाँ, यही नाम था उसका –लीचू. जब मैंने पहली बार सुना तो बड़ा ही आश्चर्य हुआ. भला ये कैसा नाम है? वो उडीसा से थी इसलिए सोचा कि कोई वहाँ का प्रचलित शब्द हो जिसे मैं नहीं जानता हूँ. उम्र यही कोई १४-१५ साल रही होगी. मैं अपनी एक दोस्त के साथ उसके घर गया हुआ था. लीचू उसकी छोटी बहन थी. जब उसने सुना कि उसकी दीदी का कोई दोस्त घर आया है तो वो मुझसे मिलने आयी. आते ही उसने दोनों हाथ जोड़ कर कहा –नमस्ते. काफी अच्छा लगा यह देख कर. बहुत ही सीधे स्वाभाव कि थी वह. शुरू –शुरू में तो वह सामने ही नहीं आना चाहती थी. पर कुछ ही देर में मुझसे बात करने लगी. बातों –बातों में उसने बताया था मुझे कि उसे दक्षिण भारतीय फिल्में बहुत ही पसंद हैं. खासकर तेलुगु. उन दिनों मैं भुबनेश्वर से ही प्रबंधन की पढाई कर रहा था और मेरे हॉस्टल में भी तेलुगु फिल्में अच्छी –खासी तादाद में देखी जाती थीं. जब मैंने उसे ये बताया की मैं भी ये सब फिल्में देखता हूँ तो उसने कुछ फिल्मों की फरमाइश कर दी कि अगली बार जब घर आना तो ये सब फिल्में जरूर लाना. मैं फिल्मों के नाम तक याद नहीं कर सका था मुझे याद है. पर मैंने उसे ये जरूर आश्वासन दिया था कि अगली बार आने पर जरूर लाऊंगा. खैर, अगली बार जाने का मौका ही नहीं मिला. मैंने अपनी दोस्त से पूछा, जो उसकी बड़ी बहन थी कि इसका नाम बड़ा अजीब सा है. उड़िया में इसका क्या अर्थ होता है. वह सुनकर हँसने लगी. बोली कि ऐसा कुछ नाम नहीं होता है हमारे यहाँ. उसने बताया कि हम सब तीन बहनें ही हैं. मेरी दादी की बहुत ही इच्छा थी कि उनके एक पोता(बेटे का बेटा) होता. पर हम सिर्फ बहनें ही हैं. जब भी वो बच्चे के जन्म की बात सुनती थीं तो अस्पताल में मम्मी को देखने के लिए आती थीं. पर जैसे ही सुनती कि लड़की हुई है वो बिना हमें देखे ही अस्पताल से वापस लौट जाती थीं. ऐसा लीचू के जन्म होने पर भी हुआ था. जब लीचू को लेकर मम्मी अस्पताल से घर आयी थीं, तो दादी नाखुश थी. जब इसे उन्हें गोद में दिया गया तो उन्होंने लेने से मना कर दिया और झल्लाते हुए कहा कि इसे “चूली” में डाल आओ. मेरे पास नहीं लाओ. ऐसा कई बार हुआ कि जब भी इसे उनकी गोद में दिया जाता तो वो नाक – भौं सिकोड़ लेती और बोलती कि – इसे “चूली” में डाल आओ. चूली का मतलब उड़िया में होता है “मिट्टी का चूल्हा”. तब से हम सब चूली को उल्टा करके इसे लीचू बुलाने लगे और इसका नाम लीचू ही पड़ गया. मैं इस बात से लेकर थोड़ा गंभीर हो गया था. बहुत सारी बातें, बहुत सारे प्रश्न में मन में अचानक ही उठने लगे थे अपनी सामाजिक व्यवस्था को लेकर. लोगों की सोच को लेकर. क्या होगा इस समाज का जो बदलना ही नहीं चाहता? इसी सोच में डूबा हुआ था कि तभी लीचू नाश्ता लेकर आ गयी. वो मुझे देखकर धीमे से मुस्कुराई. शायद उसने मेरी और उसके दीदी की बात सुन लिया था. नाश्ता कर के मैंने वहाँ से वापस हॉस्टल आने की इजाजत मांगी. मैं और मेरी दोस्त वापस आने लगे. लीचू बाहर के गेट तक हमें छोड़ने आयी. बाहर आने पर उसने हमें विदा किया और मुझे देख कर फिर से अपने दोनों हाथ जोडकर बोली –“ नमस्ते”.

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