Monday, April 9, 2012

मेरा शहर – गढ़वा

जंगल,पहाड़, नदियों, झरनों से नाता न्यारा,
हैं झारखण्ड के वासी, गढ़वा शहर हमारा।।

कोयल की लोल लहरें, तन-मन को नित पखारे,
दानरो, सरस्वती पल-पल, इसकी छवि निहारें।
माँ गढ़देवी की ममता, छलकाए अमिय धारा।।

सजते हैं छ्न्द समय के, बहती है ज्ञान गंगा,
करते हैं नाम रौशन, लहराते यश तिरंगा ।
चूमें कदम को खुशियाँ, जगमग करे सितारा॥

सच का परिन्दा उड़कर, तीन प्रांत तक हो आए,
हैं सिंह-द्वार सबका, चाहे जहां जी जाए,
मेरे भाग्य का विधाता, मेरा जीवन संवारा॥

कण-कण कहे कहानी, नीलाम्बर औ पीताम्बर की,
चेमू-सनेया के सहोदर, बलिदानी शेर बब्बर की,
पराधीनता में डुबी कश्ती किया किनारा॥

-डाँ नथुनी पाण्डेय –

अध्यक्ष, गणित विभाग,
एस एस जे एस नामधारी महविद्यालय,
गढ़वा – 822114 (झारखंड)

1 comment:

दिगम्बर नासवा said...

सुन्दर काव्यमय रचना ... भाव लिए ...