Friday, March 29, 2013

सफ़ेद जंगल... सुलगते पलाश


इधर होली के रंग हल्के हुए और उधर पलाश ने बेरुखे जंगलों में आग लगा दिया. घास सूख चली हैं और मिटटी गहरी पीले रंग की दिखाई देने लगी है. कुछ पुरानी यादों ने घेरा सो इस बार निकल पड़ा अलसुबह पास के जंगलों की तरफ. रास्ते में एक पहाड़ी नदी पड़ती है, अमूमन बरसात में ही उफनने वाली. बाकी समय फर्जी तरीके से नदी के रेत का दोहन. वैसे तो हर चीज जो यहाँ मिलती है लोगों के दूषित नजरों का शिकार हैं. पहाड़ इतने वीभत्स थोड़े ही थे. बेतरतीब पत्थरों की कटाई और ब्लास्टिंग ने इतना क्रूर रूप दे दिया है उन्हें. शहर में उगने हर वाली बड़ी इमारत की नींव खोदिये तो पत्थरों के टुकड़े वहां सिसकते नजर आ जायेंगे. किसने उनको गायब किया या आज तक कर रहे हैं, बताने की जरूरत नहीं है. खैर, पलाश, सखुआ, बीड़ी पत्ता....सबकी अपनी- अपनी दुःखभरी दास्तान है जंगलों में. जिन गाँवों का आज मैंने रुख किया था आज, कभी उन गाँवों से मेरे साथ पढने वाले लड़के-लड़कियां आते थे. तब तो न इधर पक्की सड़क थी और न दानारो नदी पर पुल. बरसात में उफ़नती नदी को पार कर जैसे-तैसे गीले कपड़ों में ही स्कूल पहुँचते थे सब. उन सभी दोस्तों का क्या हुआ मुझे नहीं मालूम. हाँ जब कभी यादें परेशां कर देती हैं तो लैप टॉप के की बोर्ड पर उँगलियाँ थिरकती हैं, गूगल में या फिर फेसबुक पर नाम टाइप करने के लिए. कुछेक दोस्त तो मिल जाते हैं पर वो नहीं मिलता जिसकी तलाश रहती है. संयोगवश आज की दुपहरी जंगल में लकड़ी के गट्ठर उठाती दो औरतें मिली. बातों- बातों में उन्होंने अपने गाँव का नाम बताया जो पास में ही था. उस गाँव कुछ लोगों को मैं जानता हूँ मेरे बचपन से. मेरे क्लासमेट थे. मैंने उनके नाम लिए उत्सुकतावश शायद वो उन्हें जानती होगी. मैंने गौर किया कि एक नाम को सुनते ही उसका चेहरा सूख गया था. मैंने जानना चाहा कि क्या वे उन्हें जानती हैं. एक औरत तो थोड़ी उम्रदराज थी उसने साथ की नवयुवती की तरफ इशारा करते कहा एक को तो वे नहीं जानती हैं. हाँ दूसरे की विधवा है यह औरत. मैंने दूसरी औरत की तरफ देखा. वह चुपचाप अपने गट्ठर बाँधने में लगी रही. किसी से मिलना भी हो रहा है तो इस तरह. नियति ने मिलाया भी तो कैसे? मैंने उससे पूछा अपने दोस्त के बारे में तो उसने दो टूक शब्दों में जवाब दिया- "पार्टी में था. पुलिस मुठभेड़ में मारा गया." सन्न रह गया था मैं उसकी बातें सुनकर.     
इस क्षेत्र में आये दिन ऐसे मुठभेड़ होते रहते हैं. अनेक लोग मारे जाते हैं चाहे वह पुलिस के हों या फिर पार्टी के लोग. कुछ की खबर अख़बारों में आ पाती है कुछ कि नहीं. कभी मरने वालों को लोग पहचानने से भी इंकार करते हैं. जो भी मरता है जैसे भी मरता हो पर उसके पीछे रह जाती हैं उनकी विधवाएं. कितनी विधवाएं कहना या अनुमान लगाना मुश्किल है. हाँ एक बात तो तय है कि उनकी संख्या हर साल बढती ही जा रही है. अपने अपने गट्ठर संभाले दोनों औरतें चली गयीं और मैं वहीँ जंगल में खड़ा रहा गया अपनी दोनों आँखें बंद किये. दिमाग में एक ही बात कौंध रही थी- जब जब यहाँ पलाश सुलगते हैं...जंगल सफ़ेद हो जाता है....वैधव्य सफेदी...आह.

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