Friday, March 8, 2013

रामेश्वरम : पत्रकार जी की डायरी -२


१५ जनवरी १९९४, अविभाजित बिहार के पलामू प्रमंडल के लिए एक ऐतिहासिक तारीख था जब डाल्टनगंज (अब मेदिनीनगर) में एफ.एम. रेडियो प्रसारण केंद्र की शुरुआत हुई. तत्कालीन केंद्र प्रभारी श्री गिरीन्द्र प्रसाद के कुशल नेतृत्व में नवस्थापित केंद्र से “ग्रामीण सभा” कार्यक्रम प्रसारित करने का निर्णय हुआ. किसानों को संबोधित कार्यक्रम का समय संध्या ७:०० बजे तय हुआ. प्रसारक मंडल में मुख्यरूप से दो प्रस्तोताओं की चर्चा हुई. एक श्री रामेश्वरम जो हर शनिवार को “पत्रकार जी की डायरी” लेकर आते थे और दूसरे गढ़वा जिले के डा० नथुनी पाण्डेय जो हर गुरुवार को “मास्टर जी” के रूप में ग्रामीण श्रोताओं और किसान भाइयों के पत्रों के जवाब “चिट्ठी मिलल” कार्यक्रम में दिया करते थे. ग्रामीण सभा की लोकप्रियता पलामू प्रमंडल के हर शहर और गांव में लगभग एक दशक तक बनी रही. यह सब संभव हो पाया रामेश्वरम के आकाशवाणी डाल्टनगंज को निस्वार्थ सहयोग और पलामू की असाधारण समझ के कारण. “आकाशवाणी गांव में कार्यक्रम” की नीले रंग की वैन पलामू प्रमंडल के हर क्षेत्र और लगभग हर गांव में गयी. जिसका कुशल नेतृत्व रामेश्वरम ने ही किया था. आकाशवाणी की टीम सुदूर जंगलों में जाती थी और ग्रामीणों और उनके विचारों से रूबरू होती थी. डा० पाण्डेय रामेश्वरम को याद करते हुए बताते हैं कि – “रामेश्वरम जी की वजह से ही आकाशवाणी पलामू प्रमंडल में जन-जन तक व्याप्त हो सकी. “पत्रकार जी की डायरी” का प्रसारण १३१ कड़ियों में लगातार हर शनिवार को हुआ. जिसमें रामेश्वरम ने पलामू से संबंधित तथ्यों, खूबियों और समस्याओं से संबंधित अपने अनुभवों के आम जनता के साथ उन्हीं की पलामावी भाषा में साझा किया. इस कार्यक्रम की जीवन्तता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि “चिट्ठी मिलल” कार्यक्रम में सबसे ज्यादा पत्र “पत्रकार जी की डायरी” के सम्बन्ध में ही आते थे.” इस बात से यह तो स्पष्ट है कि रामेश्वरम गाँवों-गाँवों के कितने प्रसिद्ध थे और उनकी समझ पलामू के बारे में कितनी गहरी थी. 
उन वर्षों में आकाशवाणी का एफ.एम. प्रसारण अपनी क्षमता के मुताबिक जन-जन में व्याप्त हो रहा था. नतीजन गांव-गांव में रेडियो सेट देखने को मिलने लगे.” यह विडम्बना ही तो है जब बिहार में राज्य सरकार महादलितों के लिए मुफ्त में रेडियो वितरण कर रही है और इसके विस्तार की योजना बना रही है, तब जब आकाशवाणी पटना के जनप्रसिद्ध ग्रामीण विकास और खेती गृहस्ती के कार्यक्रम दम तोड़ रहे हैं. पर उस दशक में पलामू में एफ.एम. सेटों की बिक्री अचानक ही बढ़ गयी थी. इसका श्रेय रामेश्वरम को भी जाता है. उस वक्त मैं हाई स्कूल में था, जब मैंने रामेश्वरम को उनके कार्यक्रम की वजह से जाना था. “पत्रकार जी की डायरी” में  एक गजब का आकर्षण था जिसने मुझे रामेश्वरम और पलामू के नजदीक लाने में बड़ी भूमिका अदा की. कई वर्षों का अथक मेहनत और संस्कृति से लगाव के कारण ही पलामू की इतनी जानकारी आम श्रोता तक पहुँच सकी. लोगों को रेडियो कार्यक्रमों के माध्यम से जागरूक करना, उनके विचारों को आम लोगों तक रेडियो के माध्यम से पहुँचाना, श्रोता संघों का संगठन तैयार करना भी उनकी दिनचर्या में शामिल था. वे श्रोता संघ के अध्यक्ष भी थे. यूँ कहें तो रामेश्वरम सही मायनों में पत्रकार थे.

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